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गौ सेवा या घोटाले का जरिया? राजस्थान के 57 करोड़ रुपये के कथित घोटाले ने उठाए कोटद्वार में भी गंभीर सवाल

राष्ट्रीय समाचार माध्यमों में प्रकाशित रिपोर्टों के अनुसार, राजस्थान में गौशालाओं से जुड़े एक कथित 57 करोड़ रुपये के घोटाले की जांच में ऐसे आरोप सामने आए कि कुछ स्थानों पर मृत या अस्तित्वहीन गायों के नाम पर अनुदान लिया गया, रिकॉर्ड में गड़बड़ियां की गईं और सरकारी धन के दुरुपयोग की आशंका जताई गई। मामले की जांच जारी है और अंतिम निष्कर्ष जांच एजेंसियों तथा न्यायिक प्रक्रिया के बाद ही स्पष्ट होंगे। �
Amar उजाला

यह मामला केवल राजस्थान का नहीं है। यह पूरे देश के लिए एक चेतावनी है कि जहां भी गौशालाओं को सरकारी सहायता दी जा रही है, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित की जानी चाहिए।
राजस्थान में गौशालाओं में कथित 57 करोड़ रुपये के घोटाले की खबरों ने पूरे देश को झकझोर दिया। जिस गाय को हमारी संस्कृति में “गौ माता” कहा जाता है, यदि उसी के नाम पर सरकारी धन का दुरुपयोग हुआ है, तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं बल्कि सामाजिक और नैतिक विश्वास पर भी चोट है।

अब सवाल राजस्थान तक सीमित नहीं रहना चाहिए।
यदि एक राज्य में ऐसा मामला सामने आ सकता है, तो क्या उत्तराखंड के कोटद्वार सहित अन्य क्षेत्रों में भी समय-समय पर गौशालाओं का स्वतंत्र ऑडिट नहीं होना चाहिए? यह किसी संस्था या व्यक्ति पर आरोप नहीं है, बल्कि पारदर्शिता की मांग है।

जनता का पैसा जनता के हित में खर्च हो रहा है या नहीं, इसका जवाब कागजों से नहीं बल्कि जमीन पर मिलना चाहिए। कितनी गौशालाएं वास्तव में संचालित हैं? उनमें कितनी गायें हैं? सरकारी अनुदान कितना मिला? उसका उपयोग किस मद में हुआ? क्या पशु चिकित्सकीय रिकॉर्ड और भौतिक सत्यापन आपस में मेल खाते हैं? इन सवालों का उत्तर जांच से ही मिल सकता है।
यदि सब कुछ सही है तो जांच से गौशाला संचालकों की विश्वसनीयता और मजबूत होगी। लेकिन यदि कहीं कोई अनियमितता है, तो उसे सामने आना भी उतना ही जरूरी है।

लोकतंत्र में पारदर्शिता किसी पर अविश्वास नहीं, बल्कि सुशासन की पहचान है। इसलिए कोटद्वार की गौशालाओं का भी समय-समय पर स्वतंत्र सामाजिक और वित्तीय ऑडिट कराया जाना चाहिए। आखिर जनता को यह जानने का अधिकार है कि गायों के नाम पर दिया गया सरकारी धन वास्तव में गायों तक पहुंच रहा है या केवल फाइलों तक सीमित रह गया है।

सवाल किसी व्यक्ति का नहीं, व्यवस्था की पारदर्शिता का है। जांच होगी तो सच सामने आएगा। यदि सब कुछ ठीक है, तो जांच से भरोसा बढ़ेगा; और यदि कहीं गड़बड़ी है, तो उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।

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