पत्रकारिता का गला घोंटा जा रहा है: उत्तराखंड में स्वतंत्र आवाज पर दमन की घटना
उत्तराखंड में एक बार फिर पत्रकारिता की स्वतंत्रता पर सवालिया निशान लग गया है। जय भारत टीवी चैनल के पत्रकार हेम भट्ट का मामला इस बात का उदाहरण है कि सत्ता के खिलाफ सवाल पूछना या असहमति रखने वाले नेताओं को प्लेटफॉर्म देना कितना महंगा पड़ सकता है।
पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मानी जाती है। यदि सरकार या सत्ता के लोग असुविधाजनक सवालों या इंटरव्यू के लिए पत्रकारों को निशाना बनाते हैं, तो यह सिर्फ एक व्यक्ति पर हमला नहीं, बल्कि पूरे तंत्र पर हमला है।
कोई भी सरकार, चाहे वह किसी भी पार्टी की हो, अपनी आलोचना सहने की क्षमता रखनी चाहिए। आंतरिक असहमति को दबाने के लिए पुलिस का इस्तेमाल करना पद का दुरुपयोग है।
यह लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं।
पत्रकारों की सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की जिम्मेदारी है। यदि असहमति रखने वाले को “ट्रोल” या “एंटी-पार्टी” करार देकर दबाया जाएगा, तो स्वतंत्र मीडिया कहां बचेगा?
स्वतंत्र पत्रकारिता जिंदाबाद। लोकतंत्र जिंदाबाद।
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